Thursday, March 2, 2017

यूं किसी का चले जाना ... जाते जाते  मुड़कर भी न देखना  .... अपनों मे  से भी कुछ अपने चुन लेना ... सबकी नजर बचाकर आंसू पोछ लेना  ...और  यूं ही अपने बहादुर  और  मजबूत होने का  परिचय देना   किसे नहीं रुला जायेगा  भला  ...?
इसी तरह चला गया  वो शख्स  जिसे  मैं  बहुत  इज्जत की नजर से देखा करती थी । हाँ वो मेरा देवर था जो अब चिर निद्रा में  सो  चूका था  ।
शेष रह गयी थी  उसकी उपस्थिति  मेरे अवचेतन तक में.......। 
क्यों किया उसने ऐसा ?  क्यों नहीं की अपनी जननी   तक से बात ? माना  की केंसर जैसी  प्राणान्तक पीड़ा से गुजर   रहा था वो.... मगर  सबको  उपेक्षा का नश्तर  चुभो गया वो ?
आत्मकेंद्रित होना या भावुक होना सिर्फ अपनी पत्नी और बचचो  तक कितना उचित था उसके लिए ?
अभी भी नहीं समझ सकी मैं ।
 कितना मानता था मुझे वो। कुछ हुआ भी तो नहीं था नाराजगी जैसा ?

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